આર્ટીકલ અને પોસ્ટ :-

Thursday, 31 January 2013

आवाज उठी हैं आज बंद सलांखो सें

दोस्त, एक आसुं न गीरे अन्नाकी आंखो सें..
क्यां उम्मिद हमे ईन पथ्थर दिल सरकारो सें
बस, कृछ चाहियें तो अन्ना के समर्थको सें
आवाज उठी हैं आज बंद सलांखो सें
दोस्त, एक आसुं न गीरे अन्नाकी आंखो सें..

भूखे पेट सोया ये बंदा 250 घंटो सें
हैं प्यार ईनको गरीबके दुःख दर्दो सें
लडने चला हैं आज, लेके देशको अपने साथ
करोडो हाथ चाहिये, क्यां होगा हजारो-लाखो सें
आवाज उठी हैं आज बंद सलांखो सें
दोस्त, एक आसुं न गीरे अन्नाकी आंखो सें..

किरनकी हैं कोशीशे, जीतना अरवींद के होंसलों सें
74बर्षकीं ईस आंधी को, नहीं उठना कीसीके कंधो सें
पर उसमांकी आंखोमें हैं दर्द, अपने बेटे की भुखका
जिसको बचपनमें हर वख्त खीलाया अपने हाथो सें
आवाज उठी हैं आज बंद सलांखो सें
दोस्त, एक आसुं न गीरे अन्नाकी आंखो सें..

अब वख्त हैं कुछ कर दिखाने का, बचना हैं ईन मुखोटो सें
ले चलो ईस आंधी को गली, महोल्ले और बाजारो सें
आज मौका मीला है तुजे अपनी जीम्मेदारी निभाने का
याद कर वो सहादत, जो चली आ रही हैं पुरखों सें
आवाज उठी हैं आज बंद सलांखो सें
दोस्त, एक आसुं न गीरे अन्नाकी आंखो सें..

हैं लाना हमे जनलोकपाल, वो भी सारी शरतो सें
गुंजेगा हर एक नारा, करोडो लोगोके मुखो सें
अन्ना हजारे को भी है हमे खाना खीलाना
चलो दोस्त, चलो, तूम भी नीकलो अब ईन बंद सलांखो सें
आवाज उठी हैं आज बंद सलांखो सें
दोस्त, एक आसुं न गीरे अन्नाकी आंखो सें..  - अंकित एम. पंड्या

સમુદ્ર મંથન - રત્ન 27




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